दहेज प्रथा: आज भी क्यों है ज़िंदा और इसका समाधान
नौ महीने तक अपने अंदर उसे महसूस करते हुए पाला, उसके आने का इंतज़ार जैसे अब सहा नहीं जा रहा था, आखिरकार वो दिन आ गया जब एक नए जीवम का इस दुनियां में आगमन हुआ। पर ये क्या खुश होने की जगह सबके चेहरों पर उदासी और मायूसी क्यों छा गई। कहीं मेरे बच्चे को कुछ हो तो नहीं गया? वो ठीक तो है?
फिर मुझे पता चला मैंने एक बेटी को जन्म दिया है।
ये एहसास न जाने कितनी माओ ने किया होगा। आज मैं आपके सामने इस उदासी और मायूसी के एक प्रमुख कारन पर प्रकाश डालूंगी
भारतीय समाज में विवाह को जीवन का सबसे पवित्र बंधन माना गया है। यह दो परिवारों का नहीं बल्कि दो आत्माओं का मिलन होता है। लेकिन दुख की बात यह है कि इस पवित्र रिश्ते पर एक काली छाया हमेशा मंडराती रही है – दहेज प्रथा।
हालाँकि, कानून और जागरूकता अभियान के बाद भी यह प्रथा खत्म नहीं हुई। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर बड़े शहरों तक, कहीं खुलेआम और कहीं छुपकर यह कुप्रथा जारी है।
सबसे बड़ा प्रश्न है – ऐसा क्यों है? और इसको खत्म करने के लिए परिवार और संस्कार कितने ज़िम्मेदार हैं?
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दहेज प्रथा क्यों आज भी ज़िंदा है?
1. सामाजिक प्रतिष्ठा का दबाव
समाज में अक्सर शादी को प्रतिष्ठा और दिखावे का माध्यम बना दिया जाता है। लोग मानते हैं कि जितना ज़्यादा दहेज और खर्च होगा, उतना ही परिवार की इज़्ज़त बढ़ेगी।
2. आर्थिक असमानता और लालच
बहुत से लोग विवाह को आर्थिक लाभ का सौदा मानते हैं। बेटा पढ़ा-लिखा और कमाने वाला है, तो दहेज लेना उसका “अधिकार” समझ लिया जाता है।
3. परंपराओं का अंधानुकरण
“हमारे दादा-नाना के समय भी दहेज लिया गया था” – इस सोच के कारण नई पीढ़ी भी इसे सही मानने लगती है।
4. भय और असुरक्षा
लड़कियों के माता-पिता को डर होता है कि अगर दहेज नहीं देंगे तो शादी टूट जाएगी। यह डर उनकी मजबूरी बन जाता है।
5. कानून का सही पालन न होना
हालाँकि दहेज निषेध अधिनियम मौजूद है, लेकिन समाज में इसका पालन सख्ती से नहीं किया जाता। अक्सर लोग समझौते में ही सब दबा देते हैं। (आप पढ़ रहे हैं ब्लॉग दहेज प्रथा: आज भी क्यों है ज़िंदा और इसका समाधान)
दहेज प्रथा के दुष्परिणाम
1. महिलाओं पर अत्याचार
दहेज न मिलने पर कई महिलाओं को मानसिक और शारीरिक यातनाएँ दी जाती हैं। घरेलू हिंसा और हत्या तक के मामले सामने आते हैं।
2. परिवारों पर आर्थिक बोझ
लड़कियों के माता-पिता अक्सर कर्ज़ में डूब जाते हैं। कई बार बेटियों की शादी के लिए घर और ज़मीन तक बेचनी पड़ती है।
3. लड़कियों को बोझ समझना
लड़कियों को आज भी कई जगह “बोझ” माना जाता है क्योंकि उनकी शादी में दहेज देना पड़ता है। इससे समाज में लिंग असमानता और गहरी हो जाती है।
4. मानसिक तनाव और आत्महत्या
दहेज की वजह से न केवल माता-पिता बल्कि लड़कियाँ भी मानसिक तनाव से गुजरती हैं। कई बार यह तनाव आत्महत्या की वजह बन जाता है।
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दहेज प्रथा रोकने में परिवार के संस्कारों की भूमिका
1. बचपन से मूल्य आधारित शिक्षा
बच्चों को बचपन से ही यह सिखाना ज़रूरी है कि विवाह पवित्र बंधन है, न कि लेन-देन का सौदा। अगर बच्चे यह सीख लेकर बड़े होंगे तो दहेज प्रथा खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगी।
2. लड़कियों और लड़कों को समान मानना
परिवार में बेटा-बेटी में भेदभाव करना सबसे बड़ी गलती है। जब तक लड़कियों को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक दहेज प्रथा खत्म नहीं होगी।
3. सादगीपूर्ण विवाह की परंपरा
परिवारों को दिखावे से बचना चाहिए। समाज को यह दिखाना होगा कि बिना दहेज और सादगी से भी खुशहाल विवाह हो सकते हैं।
4. स्वाभिमान और आत्मसम्मान की शिक्षा
बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि दहेज लेना या देना अपमानजनक है। यह उनके संस्कारों का हिस्सा होना चाहिए।
5. सकारात्मक उदाहरण
समाज को उन परिवारों को सम्मानित करना चाहिए जिन्होंने बिना दहेज के शादी की है। इससे दूसरों को प्रेरणा मिलेगी।
दहेज प्रथा रोकने के उपाय
1. कड़े कानून और उनका पालन
सिर्फ कानून होना पर्याप्त नहीं है, उसका पालन सख्ती से होना चाहिए।
2. शिक्षा और जागरूकता अभियान
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जागरूकता फैलाना ज़रूरी है ताकि लोग दहेज के खिलाफ खड़े हो सकें।
3. लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना
शिक्षा और रोजगार के अवसर देकर लड़कियों को इतना सक्षम बनाना चाहिए कि वे आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन जी सकें।
4. सामाजिक स्तर पर विरोध
जो लोग दहेज मांगते हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए।
5. युवाओं की मानसिकता बदलना
लड़कों को यह समझना होगा कि पत्नी जीवन साथी है, कोई वस्तु नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: दहेज प्रथा आज भी क्यों ज़िंदा है?
उत्तर: सामाजिक दबाव, परंपरागत सोच, आर्थिक असमानता और जागरूकता की कमी के कारण यह प्रथा आज भी जारी है।
प्रश्न 2: दहेज प्रथा से समाज को क्या नुकसान होता है?
उत्तर: इससे महिलाओं पर अत्याचार बढ़ते हैं, परिवार कर्ज़ में डूब जाते हैं और बेटियों को बोझ समझने की मानसिकता पनपती है।
प्रश्न 3: दहेज प्रथा को रोकने में परिवार की भूमिका क्या है?
उत्तर: परिवार सही संस्कार देकर, बेटा-बेटी में समानता लाकर और बिना दहेज के विवाह करके समाज को बदल सकते हैं।
प्रश्न 4: क्या दहेज प्रथा के खिलाफ कोई कानून है?
उत्तर: हाँ, दहेज निषेध अधिनियम 1961 लागू है, जिसके तहत दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं।
प्रश्न 5: दहेज प्रथा खत्म करने के समाधान क्या हैं?
उत्तर: शिक्षा का प्रसार, लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना, कड़े क़ानूनों का पालन और समाज में जागरूकता फैलाना इसके मुख्य उपाय हैं।
निष्कर्ष
दहेज प्रथा सिर्फ कानून से नहीं मिटेगी। इसे खत्म करने के लिए ज़रूरी है कि परिवार सही संस्कार दें, लड़कियों को बराबरी का हक़ दें और समाज इस कुप्रथा के खिलाफ एकजुट हो।
जब हम सब मिलकर यह संकल्प लेंगे कि शादी प्रेम और सम्मान का बंधन है, सौदेबाज़ी का नहीं, तभी दहेज प्रथा का अंत संभव होगा।
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“हँसते रहिये हँसाते रहिये, रिश्तों को मधुर बनाते रहिये”
मिलते हैं अगले ब्लॉग में, तब तक के लिए धन्यवाद।