महिलाओं की सुरक्षा: बदलते समाज की ज़िम्मेदारी
1. परिचय: क्यों बनती जा रही है सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी?
नमस्ते मेरे प्यारे पाठकों। उम्मीद करती हूँ की परमेश्वर की कृपा आप सभी पर बनी होगी। जब कभी हम समाज की बात करते हैं तो मेरे मन में एक अजीब सी चिंता घर कर जाती है। हमारा समाज इतना असुरक्षित सा प्रतीत होता है मानो आने वाले दिनों में कोई जगह सुरक्षित ही नहीं बचेगी। जब समाचारों में तरह तरह की ख़बरें सुनती हूँ तो मन और भी विचलित हो जाता है।
किसी भी तरह का अपराध करने वाले इंसान हमारे समाज के घरों में ही जन्म लेते हैं और बड़े होते हैं। आप सोच सकते हैं उनके माता पिता ने उन्हें इंसानियत सिखाया था या नहीं , किसी के तकलीफ को महसूस करना उन्हें आता तो क्या वो ऐसा करते कभी।
आप सभी से अनुरोध है की अपने बच्चों को इंसान का महत्व, रिश्तों का महत्व और समाज के प्रति उनके ज़िम्मेदारियों का महत्व का ग्यार ज़रूर दें।
महिला सुरक्षा समाज की संस्कृति, नीतियाँ और सोच का दर्पण होती है। भारत जैसे विविधताओं भरे देश में, महिलाओं के खिलाफ अपराध और असुरक्षा की घटनाएं चिंताजनक रूप से बनी हुई हैं। यह सिर्फ सरकार का काम नहीं बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है कि हम मिलकर बदलाव लाएं और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करें।महिला सुरक्षा केवल कानून या प्रशासनिक व्यवस्था का विषय नहीं—यह समाज की सोच, नीतियों और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतिबिंब है। चाहे वह सड़क हो, कार्यालय हो, ट्रेन हो या घर, हर जगह महिलाएं सुरक्षित महसूस करें, यही हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
2. हाल के आंकड़े: सुरक्षित या कम सुरक्षित?
2025 की NCRB रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या अभी भी चिंता का विषय है — कुल 4.01 लाख मामले दर्ज किए गए, जो 2024 की तुलना में सिर्फ 2.5% की मामूली गिरावट दर्शाता है।
क्राइम श्रेणियां इस प्रकार हैं: पति या रिश्तेदारों द्वारा 31%, शील भंग करने का प्रयास 20%, अपहरण 17%, और बलात्कार 8.7%। ये आंकड़े बताते हैं कि केवल कानूनों की मौजूदगी ही पर्याप्त नहीं है—सतत जागरूकता, निष्पक्ष जांच और सामाजिक समर्थन भी आवश्यक है।
3. हाल के सुधार और पहलें
(ए) परिवहन में सुरक्षा
पैलक्कड़ रेलवे डिवीजन अंतर्गत ‘मेरी सहेली’ पहल के तहत 2025 में 64 महिला RPF कर्मी तैनात किए गए, जो रोज़ाना लगभग 230 अकेली महिला यात्रियों से जुड़ते हैं, और अब तक 37,000 से अधिक महिलाओं की सुरक्षा में सहायता कर चुके हैं। साथ ही, 971 अपराधियों की गिरफ्तारी और 38 शिकायतों का निस्तारण भी हुआ है।
(बी) कार्यस्थल और नौकरी
केरल में IT पार्क्स में अब सभी कंपनियों में Internal Committees (ICs) स्थापित हो गए हैं, जो PoSH एक्ट 2013 के तहत काम करती हैं। यह मार्च 2025 तक पूर्ण हुआ।
The Times of India
एमपी में कामगार कानून में संशोधन किया गया है जिससे महिलाएं नाइट शिफ्ट में लिखित सहमति के साथ काम कर सकती हैं, साथ ही सुरक्षा और परिवहन की जिम्मेदारी नियोक्ता पर होगी।
The Times of India
सी) पब्लिक और डिजिटल सुरक्षा
मद्रास हाई कोर्ट ने AI आधारित तकनीकों का उपयोग करते हुए गैर-सहमति से बनाई गई सामग्री (NCII) को ब्लॉक करने का निर्देश दिया है।
The Times of India
10,000 आंतरिक काउंसल्टेशन पोर्टल (SHe-Box) शुरू किए गए हैं, जहाँ महिलाएं कार्यस्थल पर उत्पीड़न की शिकायत कर सकती हैं।
WomenentrepreneursReview
The LawGist
4. सामाजिक चुनौतियाँ और उनके समाधान
चुनौतियाँ:
सामाजिक मानसिकता – पारंपरिक विचार, अव्यवस्था और महिलाओं पर पिछड़ा दृष्टिकोण जारी है।
न्याय प्रणाली में देरी – अपराधों की रिपोर्टिंग के बावजूद न्याय मिलने में अक्षम प्रक्रिया को दोषी ठहराती है।
जागरूकता की कमी – सुरक्षा ऐप्स और कानून मौजूद होने पर भी जागरूकता अभाव है।
डिजिटल जोखिम – साइबर उत्पीड़न, स्टॉकिंग जैसी नई चुनौतियाँ।
घर से शुरू करें—बड़ों को सम्मान दें, महिलाओं की बात सुनें और उनका आत्मविश्वास बढ़ाएं।
पड़ोस, स्कूल और समुदाय में सुरक्षा जागरूकता पहल चलाएं।
किसी अनजान या असुरक्षित घटना पर तुरंत पुलिस या महिला हेल्पलाइन (181, 112) से संपर्क करें।
ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों और किशोरों को सम्मान, सहिष्णुता और सुरक्षा के मूल्य सिखाएँ।
5. हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी
घर से शुरू करें—बड़ों को सम्मान दें, महिलाओं की बात सुनें और उनका आत्मविश्वास बढ़ाएं।
पड़ोस, स्कूल और समुदाय में सुरक्षा जागरूकता पहल चलाएं।
किसी अनजान या असुरक्षित घटना पर तुरंत पुलिस या महिला हेल्पलाइन (181, 112) से संपर्क करें।
ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों और किशोरों को सम्मान, सहिष्णुता और सुरक्षा के मूल्य सिखाएँ।
निष्कर्ष
महिला सुरक्षा एक निरंतर प्रक्रिया है जो कानूनी सुधार, प्रशासनिक पहल और सामाजिक ज़िम्मेदारी—इन तीनों के तालमेल से संभव है।
यदि हम सभी मिलकर अपनी भूमिकाओं को गंभीरता से निभाएं—एक सुरक्षित और संवेदनशील समाज की नींव रखी जा सकती है। जब प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि में महिलाएं सुरक्षित होंगी, तभी समाज सशक्त और सुडौल बन पाएगा। आज यही हमारा साझा धर्म, ज़िम्मेदारी और प्रतीक है।