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Toggleआँगन की वो बूढ़ी दादी की डाँट में प्यार
गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होते ही हमें सबसे ज्यादा इंतजार होता था गाँव जाने का।
आज की तरह तब छुट्टियों का मतलब मोबाइल, टीवी और इंटरनेट नहीं हुआ करता था। हमारे लिए गर्मियों की छुट्टियाँ मतलब—गाँव, मिट्टी की खुशबू, खुले आसमान के नीचे सोना, आम के पेड़ और रिश्तेदारों से भरा घर।
गाँव में हमारा घर कुछ ऐसा था कि चारों तरफ कमरे और घर थे और उनके बीच में एक बड़ा-सा आँगन।
वही आँगन हमारी गर्मियों की छुट्टियों का सबसे खूबसूरत हिस्सा हुआ करता था।
सुबह होते ही वहाँ चहल-पहल शुरू हो जाती। कोई पानी भर रहा होता, कोई चूल्हे के पास बैठा होता, बच्चे इधर-उधर भाग रहे होते और बड़े लोग अपनी-अपनी बातों में लगे रहते।
लेकिन उस पूरे आँगन में एक आवाज ऐसी थी, जिसे सुनते ही हमारी सारी शरारत गायब हो जाती थी।
वह आवाज थी उस बूढ़ी दादी की।
“इतनी देर तक सोते रहते हो!”
दादी हमेशा आँगन में बैठी रहती थीं।
उम्र काफी हो चुकी थी, लेकिन आवाज में आज भी ऐसी ताकत थी कि घर के किसी भी कोने में बैठे बच्चे तक उनकी आवाज पहुँच जाती थी।
हम शहर से गाँव जाते थे।
शहर में हमें सुबह थोड़ा देर से उठने की आदत थी। छुट्टियाँ थीं, इसलिए हमें लगता था कि अब कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है।
लेकिन गाँव पहुँचते ही हमारी यह गलतफहमी दूर हो जाती।
सुबह सूरज निकल चुका होता और हम अब भी बिस्तर में पड़े रहते।
तभी आँगन से दादी की आवाज आती—
“अरे उठो! इतनी देर तक कौन सोता है?”
हम चादर के अंदर दुबक जाते।
फिर दादी हमारे पिताजी का नाम लेकर कहतीं—
“तुम्हारे पिताजी ने क्या सिखाया है तुम लोगों को? शहर में जाकर यही सीखा है कि सूरज सिर पर आ जाए और बच्चे अभी तक सोते रहें?”
बस, इतना सुनना होता था कि हम चादर से अपना मुँह और कसकर ढक लेते।
हमें डर लगता था कि कहीं दादी कमरे में आकर सच में उठा न दें।
हम धीरे-धीरे एक-दूसरे को देखकर हँसते भी थे और दादी से छिपने की कोशिश भी करते थे।
उस समय उनकी डाँट बहुत बुरी लगती थी।
मन में आता था—
गाँव में आते ही दादी पीछे पड़ जाती हैं। शहर में तो कोई हमें इतनी जल्दी नहीं उठाता।
तब कहाँ समझते थे कि उस डाँट के पीछे भी हमारे लिए चिंता छिपी हुई थी।
डाँटती थीं, लेकिन हमारी चिंता भी करती थीं
दादी की एक अजीब-सी आदत थी।
वह हमें डाँटती बहुत थीं, लेकिन हमारी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान भी सबसे ज्यादा वही रखती थीं।
उन्हें पता था कि हम शहर से आए हैं।
इसलिए बार-बार पूछतीं—
“बच्चों ने खाना खाया?”
“दूध दिया कि नहीं?”
“बहुत गर्मी है, बाहर मत भागना।”
और अगर हम खेलते-खेलते बहुत देर तक घर से बाहर रहते तो फिर वही आवाज आती—
“अब घर भी आ जाओ! धूप में क्या पड़े हो?”
हमें लगता था कि दादी बस चिल्लाती ही रहती हैं।
लेकिन आज जब उन दिनों को याद करती हूँ तो लगता है—
वह चिल्लाती कम थीं, हमारी चिंता ज्यादा करती थीं।
उनके पास प्यार जताने के आज वाले तरीके नहीं थे।
वह हमें गले लगाकर नहीं कहती थीं कि उन्हें हमारी चिंता है।
वह बस डाँट देती थीं।
कभी खाना खिलाकर।
कभी पानी पिलाकर।
कभी सिर पर हाथ रखकर।
और कभी हमारे पिताजी का नाम लेकर हमारी शिकायत करके।
शहर से आने वाले बच्चों के लिए गाँव का वह आँगन
गाँव की गर्मियों की छुट्टियाँ कुछ अलग ही हुआ करती थीं।
हम सुबह दादी की डाँट से उठते और फिर पूरे दिन इधर-उधर घूमते।
कभी पेड़ से आम तोड़ना, कभी दोस्तों के साथ खेलना, कभी घर के आँगन में बैठकर बातें करना।
दोपहर में जब गर्मी बहुत बढ़ जाती तो वही आँगन जैसे हमारा ठिकाना बन जाता।
पेड़ की छाँव में चारपाई बिछ जाती।
कोई पंखा झलता रहता और हम बच्चे अपनी दुनिया में खोए रहते।
दादी वहीं बैठी रहतीं।
कभी किसी से बात करतीं।
कभी चुपचाप हमें देखतीं।
और कभी अचानक किसी बात पर फिर डाँट देतीं।
हमारे लिए वह बस एक बूढ़ी दादी थीं, जिनकी आवाज बहुत तेज थी।
लेकिन आज समझ आता है कि वह उस आँगन की सबसे जरूरी आवाज थीं।
तब उनकी डाँट से बचते थे, आज उनकी आवाज सुनने को तरसते हैं
समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला।
गर्मियों की छुट्टियाँ खत्म हुईं और हम वापस शहर लौट आए।
फिर स्कूल शुरू हो गया।
पढ़ाई, दोस्तों और अपनी छोटी-सी दुनिया में हम व्यस्त होते चले गए।
हर साल गर्मियों में गाँव जाने का इंतजार रहता।
फिर वही आँगन।
वही घर।
वही पेड़।
वही चारपाई।
और वही दादी।
हम थोड़े बड़े होते गए और दादी थोड़ी बूढ़ी।
लेकिन उनकी आवाज वैसी ही रही।
हम फिर देर तक सोते और वह फिर हमारे पिताजी का नाम लेकर शिकायत करतीं।
हम फिर चादर में मुँह छिपाकर हँसते।
और फिर कुछ दिनों बाद शहर लौट आते।
हमें लगता था कि अगली गर्मियों में फिर यही सब होगा।
लेकिन जिंदगी हर चीज को हमेशा के लिए नहीं छोड़ती।
जो हमेशा आँगन में बैठी रहती थीं?
जो सुबह हमें जगाती थीं?
जो पिताजी का नाम लेकर हमारी शिकायत करती थीं?
जो हमारे खाने-पीने की चिंता करती थीं?
वह अब नहीं थीं?
हम गाँव पहुँचे।
घर वही था।
आँगन भी वही था।
पेड़ भी वहीं था।
चारपाई भी शायद वहीं पड़ी थी।
लेकिन कुछ बहुत बड़ा गायब था।
दादी की आवाज।
आँगन में अजीब-सी खामोशी थी।
पहले जहाँ सुबह होते ही आवाज आती थी—
“उठो! इतनी देर तक सोते हो!”
अब वहाँ कोई नहीं था।
हम चाहकर भी चादर के अंदर मुँह छिपाकर यह इंतजार नहीं कर सकते थे कि थोड़ी देर बाद दादी फिर डाँटेंगी।
उस दिन पहली बार समझ आया कि कुछ आवाजें हमें परेशान नहीं करतीं।
वे हमारे घर को घर बनाती हैं।
आँगन की छाँव सच में चली गई थी
दादी के जाने के बाद भी हम कई बार उस आँगन में बैठे।
लेकिन वह पहले जैसा नहीं लगा।
धूप वही थी।
पेड़ वही था।
हवा वही थी।
फिर भी कुछ कमी थी।
बहुत बड़ी कमी।
ऐसा लगता था जैसे आँगन की छाँव ही चली गई हो।
तब समझ आया कि छाँव केवल पेड़ नहीं देता।
कुछ लोग भी हमारे जीवन में छाँव बनकर रहते हैं।
उनकी मौजूदगी में हमें पता भी नहीं चलता कि वे हमें कितना संभाल रहे हैं।
वे हमारी चिंता करते हैं।
हमारी गलतियाँ बताते हैं।
हमें डाँटते हैं।
कभी परेशान भी करते हैं।
लेकिन उनके रहते हमें एक सुरक्षा महसूस होती है।
और जब वे चले जाते हैं, तब समझ आता है कि उनकी मौजूदगी हमारे जीवन का कितना बड़ा हिस्सा थी।
आज जब मैं अपने बचपन को याद करती हूँ तो दादी की डाँट पर हँसी आती है।
तब उनकी आवाज से बचने के लिए हम चादर में मुँह छिपाते थे।
आज मन करता है कि काश…
एक बार फिर वही आवाज सुनाई दे।
काश कोई फिर पिताजी का नाम लेकर हमें डाँटे।
काश कोई फिर पूछे—
“खाना खाया कि नहीं?”
काश कोई फिर कहे—
“धूप में मत घूमो।”
काश हम फिर चादर में मुँह छिपाकर उस आवाज से बचने का नाटक कर सकें।
लेकिन जिंदगी में कुछ “काश” कभी पूरे नहीं होते।
इसलिए शायद हमें उन लोगों की मौजूदगी की कीमत उनके चले जाने से पहले समझ लेनी चाहिए।
बचपन की यादों में कुछ आवाजें हमेशा जिंदा रहती हैं
आज गाँव का वह आँगन शायद पहले जैसा नहीं रहा।
समय के साथ घर बदल गए होंगे।
लोग बदल गए होंगे।
बच्चे बड़े हो गए होंगे।
लेकिन मेरे मन में वह आँगन आज भी वैसा ही है।
एक तरफ हम बच्चे हैं, जो चादर में मुँह छिपाकर दादी की डाँट से बच रहे हैं।
और दूसरी तरफ वह बूढ़ी दादी हैं, जो हमें डाँटते हुए भी मन ही मन यही सोच रही हैं—
“बच्चे शहर से आए हैं, ठीक से खा रहे हैं या नहीं?”
तब हमें उनकी डाँट सुनाई देती थी।
आज उस डाँट में छिपा प्यार सुनाई देता है।
और शायद यही रिश्तों की सबसे खूबसूरत बात है—
कुछ लोग हमें प्यार करना कभी शब्दों में नहीं सिखाते, लेकिन उनके चले जाने के बाद उनकी हर छोटी बात प्यार की तरह याद आती है।
रिश्तों की असली खूबसूरती
हम अक्सर अपने आसपास के लोगों को उनकी आदतों से पहचानने लगते हैं।
माँ की रोज की डाँट।
पिता की बार-बार समझाइश।
दादी की शिकायतें।
नानी के बार-बार खाना खिलाने की जिद।
हमें लगता है कि ये सब तो रोज की बातें हैं।
लेकिन एक दिन वही आवाजें बंद हो जाती हैं।
तब एहसास होता है कि हम जिन बातों से कभी-कभी परेशान होते थे, उन्हीं बातों में किसी का प्यार छिपा हुआ था।
इसलिए अगर आज आपके घर में कोई बुजुर्ग है जो आपको बार-बार टोकता है, खाना खिलाता है, आपकी चिंता करता है या आपकी छोटी-छोटी गलतियों पर डाँटता है…
तो एक पल रुककर उनकी बात सुन लीजिए।
हो सकता है कल वह आवाज आपके पास न हो।
और तब आपको उनकी डाँट भी बहुत प्यारी लगे।
निष्कर्ष
मेरे बचपन की वह बूढ़ी दादी आज हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन जब भी गर्मियों की छुट्टियाँ याद आती हैं, गाँव का वह आँगन याद आता है।
और उस आँगन के साथ उनकी आवाज भी सुनाई देती है—
“इतनी देर तक सोते रहते हो… तुम्हारे पिताजी ने क्या सिखाया है तुम्हें?”
तब हम चादर से मुँह छिपा लेते थे।
क्योंकि अब समझ आया है—
वह हमें जगाती नहीं थीं, वह हमारे बचपन को अपनी आवाज से संभाल रही थीं।
और सच कहूँ तो…
दादी के जाने के बाद सिर्फ एक इंसान नहीं गया था।
ऐसा लगा था जैसे हमारे आँगन की छाँव ही चली गई।